रेलवे वर्कशॉप या लोको शेड में बिना सही टूल्स और स्पेयर पार्ट्स के कोई भी मेंटेनेंस काम संभव नहीं है। जब भी हमें स्टोर से कोई सामान (जैसे वेल्डिंग रॉड, ग्रीस, या टॉर्क रिंच) निकालना होता है, तो हमें ‘Store Requisition Form’ or Railway RS-5 Form (जिसे आम भाषा में RS-5 या इश्यू स्लिप भी कहते हैं) भरना पड़ता है।
यह फॉर्म रेलवे अकाउंट्स और स्टोर डिपार्टमेंट के लिए एक अहम दस्तावेज है, जो यह साबित करता है कि सामान किस कोच या इंजन में इस्तेमाल हुआ। विभागीय परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है कि इसे भरते समय कौन-सी सावधानियां बरतनी चाहिए और इसके नियम क्या हैं।
वर्कशॉप के उस्ताद अक्सर नए स्टाफ को यही सिखाते हैं कि बिना सही फॉर्म भरे स्टोर से एक नट-बोल्ट भी नहीं निकल सकता। इसलिए, एक अच्छे टेक्नीशियन को इस फॉर्म के हर कॉलम की सटीक जानकारी होनी ही चाहिए।
Quick Specs / Exam Facts (एक नज़र में तकनीकी जानकारी)
| जानकारी | प्रैक्टिकल विवरण |
| फॉर्म का नाम | Store Requisition Form / Issue Note (RS-5) |
| रेलवे स्टोर कोड फॉर्म | S.1313 या S.1523 (Combined Requisition) |
| P.L. Number | 8 अंकों का (Price Ledger Number) |
| Allocation Number | यह बताता है कि खर्च किस हेड (Capital/Revenue) में जाएगा |
| साइन अथॉरिटी (Sign) | जूनियर इंजीनियर (JE) या सीनियर सेक्शन इंजीनियर (SSE) |
| रिटर्न नोट (खराब पार्ट के लिए) | DS-8 (Dead Stock Return Note) |
| LDCE/GDCE वेटेज | स्टोर और वर्कशॉप मैनेजमेंट सेक्शन (3-5 मार्क्स) |
Workshop/Track Importance (रेलवे सुरक्षा में इसकी असली अहमियत क्या है?)
अगर आप गलत स्पेयर पार्ट या टूल निकालते हैं, तो LHB कोच या इंजन की सुरक्षा सीधे तौर पर खतरे में पड़ सकती है। RS-5 फॉर्म यह सुनिश्चित करता है कि केवल पास किए गए (RDSO अप्रूव्ड) और सही स्पेसिफिकेशन वाले पार्ट्स ही कोच या वैगन में लगाए जाएं।
इसके अलावा, यह सिस्टम रेलवे का लाखों-करोड़ों का बजट और इन्वेंट्री कंट्रोल करता है। हर बोल्ट और नट का हिसाब Indian Railways Stores Code के तहत रखा जाता है, ताकि किसी भी तरह की चोरी या बर्बादी को सख्ती से रोका जा सके।
बिना इस फॉर्म के अगर डिपो में सामान कम होता है, तो रेलवे लाइन पर खड़ी ट्रेन की रिपेयरिंग (Sickline Maintenance) में भयंकर देरी हो सकती है। यही कारण है कि शेड में मटेरियल का सही रिकॉर्ड रखना एक सुरक्षित ट्रेन संचालन की पहली सीढ़ी है।
RDSO Rules & Working Principle (RDSO के नियम और काम करने का सिद्धांत)
रेलवे बोर्ड और स्टोर मैनुअल के नियमों के अनुसार, बिना सही P.L. Number (पीएल नंबर) के कोई भी डिमांड स्टोर में स्वीकार नहीं की जाती है। P.L. नंबर 8 अंकों का होता है, जिसमें पहले दो अंक ‘मेन ग्रुप’, अगले दो ‘सब-ग्रुप’, फिर तीन अंक ‘आइटम का सीरियल’ और आखिरी अंक ‘चेक डिजिट’ होता है।
फॉर्म भरते समय Allocation Number लिखना अनिवार्य है, जो यह तय करता है कि यह खर्चा रूटीन मेंटेनेंस (POH/ROH) का है या किसी विशेष प्रोजेक्ट का। बिना आपके इंचार्ज (JE/SSE) के साइन के डिपो या सब-स्टोर का वार्ड कीपर (Ward Keeper) आपको कभी सामान इश्यू नहीं करेगा।
रेलवे विभागीय परीक्षा और प्रैक्टिकल नोट्स की ऐसी ही अन्य जानकारी के लिए Sarkari Resultine पर विज़िट करें। यह जानकारी आपको वाइवा और लिखित परीक्षा, दोनों में काफी मदद करेगी।
![Railway RS-5 Store Requisition Form]](https://sarkariresultine.com/wp-content/uploads/2026/08/Gemini_Generated_Image_n4yxvin4yxvin4y-50kb-1024x571.jpg)
Copy-Paste Revision Notes (परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण नोट्स)
रेलवे विभागीय परीक्षा (LDCE/GDCE) रिवीजन नोट्स: Requisition Form (RS-5 / S.1313)
1. P.L. Number का फुल फॉर्म 'Price Ledger Number' है और यह हमेशा 8 डिजिट का होता है।
2. P.L. नंबर का आखिरी (8वां) अंक 'Check Digit' कहलाता है, जो कंप्यूटर द्वारा गलतियों को पकड़ता है।
3. डिमांड स्लिप आमतौर पर 6 कॉपियों में (कार्बन लगाकर) बनाई जाती है, जो अकाउंट्स, स्टोर और शेड में बंटती हैं।
4. Allocation Number से यह तय होता है कि किस फंड से इस मटेरियल का पैसा कटेगा (जैसे Revenue या Capital)।
5. फॉर्म पर हमेशा 'Quantity in Figures' और 'Quantity in Words' दोनों स्पष्ट रूप से लिखे होने चाहिए।
6. जब भी कोई पुराना या खराब पार्ट बदलकर नया लेना हो, तो उसे 'Return Note' (D.S. 8) के जरिए वापस करना होता है।
7. 'A' Category के आइटम हाई-वैल्यू होते हैं, जिनकी इन्वेंट्री पर रेलवे सबसे ज्यादा निगरानी रखता है।
8. 'Stock Items' हमेशा स्टोर में उपलब्ध होते हैं, जबकि 'Non-Stock Items' को स्पेशल डिमांड पर खरीदा जाता है।
Troubleshooting & Maintenance (खराबी और मेंटेनेंस का सही तरीका)
वर्कशॉप में ड्यूटी के दौरान टूल्स निकालते समय ‘RS-5 Form’ कैसे भरें, आइए इसका स्टेप-बाय-स्टेप प्रैक्टिकल तरीका समझते हैं।
सबसे पहले ‘Nomenclature’ (विवरण) कॉलम में टूल या पार्ट का सही नाम और उसका स्पेसिफिकेशन लिखें (जैसे- CBC Knuckle, M-16 Bolt, या 180mm Grinding Wheel)।
इसके बाद सबसे ज़रूरी काम है 8 अंकों का P.L. Number बिल्कुल साफ-साफ लिखना। अगर एक भी अंक गलत हुआ तो वार्ड से सामान वापस कर दिया जाएगा और आपकी रिपेयरिंग का काम रुक जाएगा।
‘Quantity Required’ कॉलम में जरूरत भर ही सामान लिखें (जैसे 5 Nos. या 2 Kgs) और इसे शब्दों में भी (Five Numbers Only) ज़रूर लिखें। शब्दों में लिखने से कोई भी बाहरी व्यक्ति आपके फॉर्म में ओवरराइटिंग करके ज्यादा सामान नहीं निकाल सकता।
नीचे ‘Indentor’ की जगह पर अपना या अपने JE (Junior Engineer) का साइन करवाएं और उस दिन की डेट डालें। वार्ड कीपर जब सामान दे दे, तो ‘Received By’ कॉलम में साइन करके अपना टोकन नंबर (Ticket No.) जरूर दर्ज करें।

Senior Technician’s Secret Tips (सीनियर उस्ताद के सीक्रेट टिप्स)
एक उस्ताद होने के नाते मैं आपको हमेशा एक बात याद रखने को कहूंगा: कभी भी फॉर्म में कटिंग (Overwriting) या व्हाइटनर का इस्तेमाल मत करो। अगर कोई गलती हो जाए, तो उसे एक लाइन से काटकर वहीं पर JE साहब का ‘इनिशियल (Initial)’ साइन करवा लो, वरना स्टोर वाले आपको वापस भेज देंगे।
दूसरी सीक्रेट टिप: जब भी आप कोई कीमती टूल (जैसे वर्नियर कैलिपर या टॉर्क रिंच) निकालते हैं, तो हमेशा अपनी पर्सनल डायरी में उसकी डेट और टूल नंबर नोट कर लें। ड्यूटी खत्म होने पर जब आप उसे वापस ‘Tool Room’ में जमा करेंगे, तो यही रिकॉर्ड आपको किसी भी तरह की पेनाल्टी या रिकवरी (पैसे कटने) से बचाएगा।
आज का डिजिटल रेलवे: UDM (User Depot Module) और पेपरलेस वर्किंग
आजकल रेलवे बहुत एडवांस हो गया है और हमारा शेड पूरी तरह से पेपरलेस (Paperless) वर्किंग की तरफ बढ़ रहा है। इसी कड़ी में रेलवे बोर्ड और CRIS (Centre for Railway Information Systems) ने पूरे भारत में ‘UDM’ (User Depot Module) लागू कर दिया है।
अब शेड या सिकलाइन में किसी भी स्पेयर पार्ट की डिमांड पुराने RS-5 फॉर्म के बजाय सीधे डिजिटल तरीके से UDM पोर्टल पर की जाती है। आपके इंचार्ज (JE या SSE) अपने मोबाइल या कंप्यूटर से ऑनलाइन अप्रूवल देते हैं, जिससे स्टोर डिपो से मटेरियल का डिजिटल इश्यू नोट तुरंत जनरेट हो जाता है।
Practical Example (एक असली उदाहरण: RS-5 में एंट्री कैसे दिखती है?)
अगर आप पहली बार डिमांड स्लिप भर रहे हैं या UDM में फीडिंग कर रहे हैं, तो नीचे दिए गए उदाहरण को रट लें। यह छोटी सी जानकारी आपको वर्कशॉप में किसी भी बड़ी गलती या चार्जशीट से बचाएगी।
| कॉलम का नाम | आपको क्या भरना है (उदाहरण) |
| Consignee / Indentor | SSE / C&W / Depot Code |
| P.L. Number | 30987654 (8-Digit Code) |
| Description | Brake Block (LHB) / ‘L’ Type |
| Quantity in Figures | 15 Nos. |
| Quantity in Words | Fifteen Numbers Only |
| Allocation / Head | 207128-04 (Revenue / Maintenance) |
ABC Analysis (ABC एनालिसिस: विभागीय परीक्षा का फेवरेट टॉपिक)
रेलवे स्टोर और इन्वेंट्री कंट्रोल में ‘ABC Analysis’ बहुत मायने रखता है और LDCE/GDCE परीक्षा में इसका सवाल पक्का छपता है। ‘A’ केटेगरी में वो स्पेयर पार्ट्स आते हैं जिनकी कीमत बहुत ज्यादा (High Value) होती है, जैसे इंजनों के ट्रैक्शन मोटर या LHB कोच के व्हील सेट।
वहीं ‘C’ केटेगरी के आइटम (जैसे नट, बोल्ट, स्प्लिट पिन) बेहद सस्ते होते हैं लेकिन शेड में बहुत भारी मात्रा में (High Volume) इस्तेमाल होते हैं। रेलवे अपने स्टोर बजट का लगभग 70% पैसा सिर्फ ‘A’ केटेगरी के पार्ट्स पर खर्च करती है, इसलिए इनका स्टॉक वेरिफिकेशन (ऑडिट) सबसे ज्यादा सख्त होता है
Top 3 Viva/Interview FAQs (विभागीय परीक्षा और वाइवा के 3 सबसे ज़रूरी सवाल)
सवाल 1: स्टोर कोड में P.L. नंबर का क्या महत्व है और इसके कितने अंक होते हैं?
जवाब: P.L. नंबर (Price Ledger Number) से पूरे भारतीय रेलवे में किसी भी स्पेयर पार्ट की पहचान स्टैंडर्ड हो जाती है। यह 8 अंकों का होता है, जिसका आखिरी अंक चेक डिजिट होता है, जो कंप्यूटर फीडिंग में होने वाली गलतियों को तुरंत पकड़ लेता है।
सवाल 2: अगर आपको शेड में अचानक रात की शिफ्ट में कोई पार्ट चाहिए और जनरल स्टोर बंद है, तो क्या करेंगे?
जवाब: ऐसी इमरजेंसी में ‘Imprest Store’ (इम्प्रेस्ट स्टोर) का इस्तेमाल किया जाता है, जिसका अधिकार सीधे शिफ्ट इंचार्ज (SSE/JE) के पास होता है। इसके लिए एक अलग रजिस्टर मेन्टेन किया जाता है, जिसे बाद में रेगुलर इश्यू नोट (RS-5) बनाकर स्टोर से सेटल कर लिया जाता है।
सवाल 3: Non-Stock Item (नॉन-स्टॉक) और Stock Item में क्या अंतर है, जो परीक्षा में बार-बार पूछा जाता है?
जवाब: ‘Stock Items’ वो हैं जिनका P.L. नंबर होता है और जो शेड में रेगुलर इस्तेमाल होते हैं, इन्हें हमेशा स्टोर में रिज़र्व रखा जाता है। ‘Non-Stock Items’ वो हैं जिनकी ज़रूरत कभी-कभार पड़ती है, इन्हें ख़ास डिमांड (Non-stock Requisition) भेजकर लोकल पर्चेस के ज़रिए बाहर से खरीदा जाता है
सवाल 4: पुराना या खराब मटेरियल (Scrap) स्टोर में वापस जमा करने के लिए कौन सा फॉर्म भरा जाता है? जवाब: जब हम शेड में कोई पुराना पार्ट (जैसे घिसा हुआ ब्रेक ब्लॉक या टूटा हुआ स्प्रिंग) निकालते हैं, तो उसे ‘Return Note’ के जरिए वापस स्टोर या स्क्रैप यार्ड में भेजा जाता है। इस रिटर्न नोट को रेलवे की तकनीकी भाषा में DS-8 फॉर्म (Dead Stock-8) कहते हैं, जो अकाउंट्स ऑडिट के लिए सबसे अहम पेपर है।
सवाल 5: Imprest Store (इम्प्रेस्ट स्टोर) की लिमिट कैसे तय होती है? जवाब: इम्प्रेस्ट स्टोर में सिर्फ वही आइटम रखे जाते हैं जो रोज़मर्रा के रूटीन मेंटेनेंस (POH/ROH) में अनिवार्य रूप से लगते हैं। इसकी लिमिट पिछले 3 महीने की औसत खपत (Average Consumption) के आधार पर तय की जाती है, ताकि रात की शिफ्ट या इमरजेंसी में डिपो का काम कभी ना रुके।
चलते-चलते एक बात हमेशा याद रखें कि रेलवे के नए नियमों के साथ खुद को अपडेट रखना ही एक होशियार उस्ताद की असली पहचान है। रेलवे विभागीय परीक्षा और प्रैक्टिकल नोट्स की ऐसी ही अन्य जानकारी के लिए Sarkari Resultine पर विज़िट करें, ताकि आप अगले डिपार्टमेंटल एग्जाम में सीधा टॉप मार सकें!
